क्या हाथ को बचा पाएगा शीला का साथ !

अजय कुमार त्रिपाठी, आगामी विधान सभा चुनाव में कांग्रेस की तरफ से उत्तर प्रदेश में शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाया गया है. यह बढ़िया फ़ैसला है. पहले प्रियंका की सक्रियता की ख़बर. फिर राज बब्बर को प्रदेश अध्यक्ष बनाना. और अब शीला दीक्षित. कांग्रेस पार्टी में पूरी जान फुकने की कोशिश होती दिखती है. इसमें कोई सुबहा नहीं है कि शीला दीक्षित ने बतौर 15 साल लगातार सीएम के रूप में दिल्ली में अच्छा काम किया है और दिल्ली को दिल्ली बनाने में उनका बड़ा रोल है. कांग्रेस उनकी इसी छवि के सहारे यूपी के गढ़ को फ़तह करना चाह रही है. उनके साथ यूपी फ़तह की भूमिका में प्रदेश प्रभारी गुलाम नबी आजाद और प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर भी हैं. गुलाम नबी आजाद और राज बब्बर (मशहूर शायर कैफी आजम के दामाद) पर मुस्लिम मतदाताओं का पूरा सद्भाव है. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की बेटी प्रियंका गांधी वाड्रा भी उत्तर प्रदेश के चुनाव में प्रचार करेंगी. वे अमेठी और रायबरेली से बाहर दूसरे इलाकों में भी प्रचार करेंगी. इस तरह यूपी की बेटी प्रियंका और बहू शीला दीक्षित की जोड़ी कांग्रेस की डूबी लुटिया को पार लगाने का भरसक प्रयास करती नजर आएँगी. शीला दीक्षित को लाकर कांग्रेस यह बताने का प्रयास कर रही है की 1989 में जब वह सत्ता से बाहर हुई तब एनडी तिवारी मुख्यमंत्री थे. उसके बाद यूपी में कोई ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं बना. इसलिए अब फिर एक ब्राह्मण को कांग्रेस ही मुख्यमंत्री बनाएगी. पर यह काम 27 सालों से सत्ता से बाहर रह रही और वर्तमान में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही पार्टी के लिए बंजर जमीन पर फसल उगाने जैसा ही होगा. पर यह नामुमकिन तो नहीं लेकिन खासा मुश्किल जरूर है. अब यदि यूपी में वोट आंकड़ों पर नजर डाले तो ज्यादातर ब्राह्मण बीजेपी और बसपा को अपना वोट देते हैं. ओबीसी सपा को पिछड़ी जाति बसपा को वोट देती हैं. यहाँ मुख्य लड़ाई दलित और मुस्लिम वोट बैंक को लेकर होती है. जिसे सभी पार्टियाँ अपनी तरफ खीचने में लगी दिखती हैं. लेकिन शायद कांग्रेस जिसके पास खोने को कुछ नहीं है और पाने के लिए सबकुछ है ने यह रणनीति बनाई है कि ब्राह्मण वोट को गोलबद्ध किया जाय. जिससे अगर वह चुनाव में कुछ ख़ास न भी कर पाएं तो कम-से-कम किंग मेकर की भूमिका में अवश्य रहें. कांग्रेस को उम्मीद है कि शीला दीक्षित कुछ करिश्मा तो अवश्य दिखाएंगी. वर्तमान समय में भाजपा की केंद्र सरकार से और जमीनी हकीक़त के स्तर पर उनकी विफलता से साधारण मतदाताओं का मोहभंग हुआ है. मंहगाई, पाकिस्तान और कश्मीर पर लगातार निकम्मी और सांप्रदायिकता के बोल-बचन ने भाजपा की छवि लोगों के जेहन से धूमिल किया है. खराब छवि वाले केशव प्रसाद मौर्या को प्रदेश अध्यक्ष चुना जाना भी लोगों को खटक रहा है. सपा की सरकार की विफलता से लोग आये दिन दो-चार हो रहे हैं. पत्रकारों की मौत, मुजफ्फरनगर हिंसा और मथुरा में रामवृक्ष यादव का जख्म लोग अभी भी नहीं भूल पाएं हैं. लचर कानून व्यवस्था की पोल खोलता कैराना भी लोगों के जेहन में बना हुआ है इसके साथ पारिवारिक कलह भी हार की एक वजह बन सकती है. अब देखना यह है जिस शीला दीक्षित को उन्नाव के बहू के रूप में अपनी पहचान देने की अवश्यकता पड़ रही है. उस बहू को क्या यूपी वाले स्वीकार कर सेवा करने का एक मौका देते हैं? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा. पर इतना तो तय है की शीला दीक्षित के आने से कांग्रेस के कार्यकर्ता और कांग्रेस पार्टी फिर से पुनर्जीवित हो जाएगी और पार्टी का वजूद पिछले चुनाव के मुकाबले बेहतर स्थिति में होगी.

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