मान सम्मान से ऊपर देशहित !

*अजय कुमार त्रिपाठी* भाजपा उपाध्यक्ष दयाशंकर का विवाद अभी थमा भी नहीं था कि एक नया विवाद सांसद भगवंत मान के रूप में प्रगट हो गया. सांसद को मिले विशेषाधिकार के तहत संसद के अन्दर फ़ोन ले जाने का अधिकार मिला हुआ है. पर इससे यह तात्पर्य कदापि नहीं है कि संसद की गतिविधि की जानकारी (किसी भी मंसा के तहत) लोगों को उपलब्ध कराने के लिए आप फेसबुक पर प्रसारित करे, आपकी यह लापरवाही नियमों के उलंघन के साथ संसद की आंतरिक सुरक्षा से भी जुड़ी हुई है. पूर्व में सांसद को आतंकी गतिविधि का निशाना भी बनाया जा चुका है आतंकी लगातार देश को अस्थिर करने में लगे हुए हैं. कभी यहाँ पाकिस्तानी झंडे फहराए जा रहे है तो कल कहीं दूसरी जगह. तनिक असावधानी भी संकट खड़े कर सकती है. फिर ऐसा कृत्य कर जब आप की आलोचना हो तो आप अपनी गलती स्वीकारने, शर्मिंदा होने या मांफी माँगने के बजाय हेकड़ी दिखाते हुए इस अनुचित कृत्य की पुनरावृत्ति करने की बात कहें. जब बात हाथ से निकल जाए तो माफ़ी मांग मामले को रफा-दफा करने की प्रवृति में आ जाए. यह और भी अनुचित है. अफ़सोस का विषय यह भी है कि ‘आम आदमी पार्टी’ आपकी माफ़ी के बाद भी आपके कृत्य को सही साबित करने में जुटी रही. अब जब लोकसभा अध्यक्ष तक बात पहुंची है और उन्होंने माना है की मामला गंभीर है और सिर्फ मांफीनामे से काम नहीं चलने वाला तो बहुत संभव है की आगे चलकर विशेषाधिकार प्रक्रिया में फेरबदल भी दिखाई पड़े. आखिर संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही/ गतिविधि और महत्वपूर्ण आवश्यक मुद्दे को जनता तक नीतिगत रूप से पहुंचाने के लिए टीवी चैनल हैं, जिनके माध्यम से प्रसारण का कार्य किया जाता है. वीडियो बनाना और प्रसारण करना मीडिया का काम है तो क्यों न उन्हें ही करने दिया जाए. रही संसद की कार्यवाही संचालन हेतु जागरूकता की बात तो उस हेतु भी काफी प्रिंट और वीडियो सामग्री उपलब्ध है. फिर माननीय अपनी ऊर्जा ऐसे विषयों में क्यों खर्चे ? वह क्यों न अपनी पूरी शक्ति अपने चुनावी क्षेत्र की समस्याओं और उनके निस्तारण में लगाए. पर कुछ प्रतिनिधियों को लगता है की वो जो चाहे कर सकते हैं. उनकी की हुई हर बात जायज है. गलती होने पर भी अपनी बात को ही सिद्ध करने पर लगे रहते हैं. यही हो रहा है. सदन स्थगित करने पड़ते हैं और महत्पूर्ण मुद्दों को जिनको तरजीह मिलनी चाहिए की जगह अनर्गल प्रलाप के मुद्दे छाए रहते हैं. आजकल यह प्रवृत्ति भी देखने को मिल रही है की जो मुद्दा मीडिया में छाया हो वही संसद में बहस का विषय भी बन जाता है. फिर चाहे वह गुजरात दलित उत्पीड़न का विषय हो या दयाशंकर की मायावती हेतु अभद्र भाषा या भगवंत मान का मसला. क्या तयशुदा महत्पूर्ण एजेंडे पर पर्याप्त ध्यान देने के बजाय हम खबरिया चैनलों के लिए मुद्दा बने विषयों में ही भटके रहेंगे? राजनीतिक दलों को यह कब अहसास होगा कि उनके अड़ियल रुख-रवैये के कारण संसद में अनेक राष्ट्रीय महत्व के मसले अटके पड़े हैं. जिससे वह हासिल होना है जो देश चाहता है. जिसके लिए जनता ने आप को बहुमत देकर भेजा है.

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